Chamatkari Totke "Vashikaran Without - An Overview +91-9779942279




'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार उपेन्द्रनाथ अश्क ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'पलंग', 'आकाशचारी', 'काकड़ां का तेली', 'उबाल', 'मि० घटपाण्डे', 'बैंगन का पौधा', 'डाची', 'पिजरा', 'काले साहब' और  'अजगर' ।

टकराने में / उठती चिनगारियाँ / देख पाएँ तो / अँधेरे की दीवारों में / वे चमकते नक्षत्रों-सी / खिड़कियाँ हो जाती हैं।

Vashikaran Totke are the house centered solutions and ways to observe the Vashikaran on any person. These methods are particularly simple and easy to perform which you can utilize at your very own level. There are actually not numerous costs to take advantage of these kinds of techniques.

पश्चिम की उपभोक्तावादी संस्कृति और सभ्यता के दुष्प्रभाव ने भारतीय समाज में नारी समाज के यथार्थ को बदल दिया है। पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित नारी स्वयं वंदनीय न मानकर स्वयं को पुरुषों के समान बनने के लिए आंदोलनरत है। सदियों से पीडित नारी का सब्र का बांध टूट गया है। प्राचीन परंपराओं की पकड़ से बाहर आ गई है। अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो रही है। आज की शिक्षित नारी अत्याचार के विरोध में बलपूर्वक खड़ी हो रही है। आधुनिक माहौल में तमाम लड़कियां घर की देहरी लांघकर स्वावलंबी हो रही है । आधुनिक भारतीय नारी अन्याय और अत्याचार को चुपचाप नहीं सहती, बल्कि उसका प्रतिकार कर समाज  में अपने लिए अलग जगह बनाती है। आज की नारी स्वतंत्रता चाहती है। वह पुरुष की अधीनता में रहना नहीं चाहती। वह पुरे प्राणवेग के साथ जाग उठी है।

'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

गौतम बुद्ध ने भिक्षुओं को अत्यंत सादा जीवन व्यतीत करने की सलाह ही । यज्ञ-बलि की वे सर्वत्र निंदा करते थे और उसे निकृष्टतम  कृत्य मानते थे । वास्तव में वे करुणा के अवतार थे । उनका संदेश था कि मनुष्य को सामाजिक हित का सदैव ध्यान रखना चाहिए । वे एकांतवास के पक्षधर थे ।

मोहन चोपड़ा का कथा-संसार मध्यवर्गीय सामाजिक जीवन की विडंबनाओं, अंतर्विरोधों और मूल्यों के विघटन के इस दौर में एक व्यक्ति के अंतःसंघर्ष की गाँठें खोलता है। पूँजीवादी संस्कृति और बाज़ार के दबावों के बीच मनुष्य के लगातार एक उपभोक्ता में बदलते चले जाने तथा भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों के क्षरित होने की पृष्ठभूमि से उपजी हताशा, मोहभंग, अनास्था और अकेलेपन के बीच कहानीकार संबंधों के सत्त्व और मानवीय ऊष्मा की गहन खोज में प्रवृत्त है तथा वह हमें उम्मीद की टिमटिमाती रोशनियों को सहेजने के लिए प्रेरित भी करता है।

सत्ता और सेवा, सत्ता और तप, सत्ता और मनीषा इनका परस्पर क्या संबंध है, अनादिकाल से हम इसी प्रश्न से जूझते आ रहे हैं। कितने रूप बदले सत्ता ने। बाहरी अंतर अवश्य दीख पड़ा, पर अपने वास्तविक रूप में वह वैसे ही सुरक्षित रही, जैसे अनादिकाल में थी, अनगढ़ और क्रूर।

नेत्र हीनों का कृतित्व इतना सुंदर क्यों होता है, विकलांग वैज्ञानिकों द्वारा किए गए आविष्कार इतने उपयोगी क्यों होते हैं, निरंतर ये प्रश्न उठते हैं और उत्तर मिलता है कि शिक्षा असंभव नहीं हो सकती, चाहे विकलांगता कितनी भी गंभीर क्यों न हो । इस पुस्तक में उपरोक्त निष्कर्ष लम्बे और गहन शोथ के बाद निकाले गए हैं ।

घर.गिरस्ती, हाट.बाजार, सफर और समय की अनंतता के बीच नीलेश रघुवंशी कब ‘पर्सनल’ को ‘पाॅलिटिकल’ बना देंगी, कहना मुष्किल है। वे पर्यटक की निगाह से चीजों को नहीं देखतीं-जीवनअरण्य में धँसती हैं और स्त्री मुक्ति के साथ सामाजिक मुक्ति के लिए विकल.व्यग्र होती हैं।

साहित्य समाज का दर्पण है। काव्य समाज का स्वरूप है। समाज के अनुरूप ही काव्य की रचना होती है। यह धारणा अनादिकाल से चली आ रही है, जो आज भी चरितार्थ है। काव्य और साहित्य का अन्योन्याश्रय संबंध है। अद्यतन कवि की रचना संसर्ग से प्रभावित होती है। चूँकि कवि भ्रमणशील होते हैं, इसलिए संसर्ग गुणों का प्रभाव उन पर पड़ता ही है। ‘संसर्गजा दोष गुणा भवंति’ यह सूक्ति सार्थक प्रतीत होती है। साथ ही आज काव्य की रचना समाज की माँग के अनुरूप होती है। कवि जब आत्मा की आवाज को सुनकर रचना करता है, तब वह हृदयस्पर्शी हो जाता है। कवि की कवित्व शक्ति अनंत होती है। यह पूर्व संस्कारों से मिलती है। ‘नरत्वं दुर्लभं लोके विद्या तत्र सुदुर्लभा, कवित्वं दुर्लभं तत्र शक्तिस्तत्र सुदुर्लभा’।

आर्य जीवनकला का सर्वांगीण विकास हमें कृष्ण के पावन चरित्र में दिखाई देता है । जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जिसमें उन्हें सफलता नहीं मिली । सर्वत्र उनकी अदभुत मेधा क्या सर्वग्रासिनी प्रतिभा के दर्शन होते हैं । वे एक ओर महान् राजनीतिज्ञ, क्रान्तिबिधाता, धर्म पर आधारित नवीन साम्राज्य के स्रष्टा राष्ट्रपुरुष के रूप में दिखाई पडते हैं तो दूसरी ओर धर्म, अध्यात्म, दर्शन और नीति के सूक्ष्म चिन्तक, विवेचक क्या प्रचारक भी हैं। उनके समय में भारत देश सुदूर गांधार से लेकर दक्षिण की सह्याद्री पर्वतमाला तक क्षत्रियों के छोटे-छोटे, स्वतंत्र किन्तु निरंकुश राज्यों में विभक्त हो चुका था । उन्हें एकता के सूत्र में पिरोकर समय भरतखण्ड को एक सुदृढ़ राजनीतिक इकाई के रूप में पिरोने वाला कोई नहीं था ।

कभी ठाकुर प्रसाद सिंह ने ‘पाँच जोड़ बाँसुरी’ लिखकर रोमानी अनुभूतियों के प्रदेश में एक हलचल मचा दी थी। ‘वंशी और मादल’ के इस गीत website को नवगीत के स्थापत्य में नवता के उन्मेष के रूप में देखा गया। गीत स्निग्धता के लिए जाने जाते रहे हैं, उनकी कोमल पदावलियों को केदारनाथ अग्रवाल ने अपने कवि-जीवन में एक अनिवार्य तत्त्व के रूप में ग्रहण किया है। आज भी हम उनकी कविताएँ पढ़ते हैं तो लगता है, माँझी कहीं दूर वंशी बजा रहा है और उसकी टेर हमारे भीतर सुनाई दे रही है। वह किसी कान्हा की बाँसुरी से कम नहीं है। जीवन में प्रेम हो तो समूची कविता मानवीय प्रेम की व्यंजना में बदल जाती है। केदार जी ने कविता में यही किया है।

आधुनिक हिंदी कविता अनेक दृष्टियों से विशिष्ट कविता है। उसकी विशिष्टता इस बात में है कि उसमें अनुभूति और अभिव्यक्ति से संबंधित इतनी विविधता है जितनी आधुनिक काल से पहले की किसी भी काल की कविता में नहीं रही। उसकी इस विविधता में अंतःसलिला के रूप में ऐसी एकरूपता भी है जो उसे एक स्वतंत्र इकाई बनाती है। उसकी विभिन्न प्रवृत्तियों को विशिष्टता और उसकी समग्र एकरूपता को पकड़ने और रेखांकित करने के अनेक प्रयत्न विभिन्न विद्वानों ने किए हैं। उन्हीं प्रयत्नों की शृंखला में एक प्रयत्न यह पुस्तक है। ‘इस पुस्तक की मुख्य विशेषता यह है कि इसमें भारतेन्दु-युग से लेकर नवें दशक तक की हिंदी कविता की सभी प्रमुख प्रवृत्तियों की क्रमिक चर्चा है। इस कारण कोई चाहे तो इसे आधुनिक हिंदी कविता का प्रवृत्यात्मक इतिहास भी कह सकता है।’ पाठकों को इस पुस्तक में हिंदी के सुख्यात आलोचक डाॅ.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *